सोमवार, दिसंबर 6

एक बार मिला ये जीवन,
कैसे व्यर्थ गवां दू इसको?
रेत बनकर फिसल रहा ह ये,
बूंद- बूंद टपक रहा,

बन जाऊ
कोई जल-पत्र,
संचय कर लूँ सारा जल,
अंजुली में भरकर रेत को ,
बीज बो दूँ कोई,
जो हो जायेगा हरा भरा
पूरा वन

ऐसा नहीं पहला ह मेरा प्रयास ये,
जल संचय किया भी मैंने
अंजुली में रेत भरी थी ,
उगा  वो हल्का हरा
मासूम  सा  पौधा
कई  बार  था

रौंध दिया कई पावों ने
सूख गया  लूँ के थपेड़ों से
उस जमीन में घाव सा पड़ गया


जलन कि बू,
तपन कि शक्ति
बन गयी है खाद अब

उपजाऊ है मेरी जमीन
इस बार इतना जल
का होगा संचय
ना गरम हवा से जलेगा
ना बर्फ का होगा असर
बारूद की
तरह
जवाल्मुखी की
तरह
अन्दर से बाहर फटेगा

इस बार होगा तना
ऐसा मजबूत
कोई साहस ना
कर पाएगा
पैरों से रोंधने  का

फूलों कि खुशबु
से जलन की  बू
नहीं रहेगी

मिटटी  की सौंदी खुशबू
से महकेंगे मन
और उसकी छाँव में
सुखमय होगा जीवन







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7 टिप्‍पणियां:

Jam ने कहा…

Very Beautiful.... :)

Gunjan ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Gunjan ने कहा…

thank you..
u understand hindi?
where r u from man?
may i know you ?

hindizen.com ने कहा…

Mr. Jam is now indeed in soup.:)
Beautifully composed poem with just enough words to express sentiments. Congrats.

Jam ने कहा…

lol... google translated it for me.

I'm pretty sure you don't know me, just admiring your work :)

Gunjan ने कहा…

thanks jam...:)

Gunjan ने कहा…

hindizen.com
thank you