शनिवार, फ़रवरी 19

मजदूर हूँ मैं

छाले पड़ गये पांव में,
अंखिया दुखने लगी हैं,
हाथ कपकपाते हैं,
साँझ होने लगी हैं,

सूरज डूबता हुआ सा
धुंधला सा दिखा वही,
अब मालिक जाने दो,
बच्चे भूखे न सो जाये 
कंही.

तसली उठाये हाथ में,
मुस्कुराता रहता हूँ ,
थकने का अहसास कभी न 
खुद को होने देता हूँ , 

दीवार की ऊंचाई से 
जुडी खुशिया,
फटकार से
सजा है जीवन मेरा .

मजदूर हु मैं 
सही मायने में 
जीना सीखा मैंने
बोझा उठाया 
बची इंसानियत का 
दुसरो की जिंदगी में 
रोनक लाया 
सबको सिने से लगाया
मैंने 


मन की लालसा 
हृदय का स्पंदन 
अभी बाकी है ह मेरा
परन्तु 
कर्म से ना
डगमगाया

कर्ज का बोझा
ऐसा आया 
कमर झुकी मेरी
मैं उठा ना पाया

उधर भी माँगा जो
मजदूर को 
बदनाम करवा आया

करते कुछ हैं नहीं
दाम चाहिए इनको
मुफ्त का खाना ,
आदत है इनकी

ये सब सुनने में आया
मेहनत तो की है मैंने
फिर क्यों ऐसा 
समय आया?

मन की लालसा 
हृदय का स्पंदन 
अभी बाकी है ह मेरा
परन्तु 
कर्म से ना
डगमगाया

मजदूर हूँ  मैं 
सही मायने में 
जीना सीखा मैंने
ऐसा प्रतीत हुआ,
बोझा उठाया 
बची इंसानियत का 
मैंने
- गुंजन झाझरिया



कोई टिप्पणी नहीं: