शनिवार, जून 4

पंछी-ओ-पंछी


पंछी-ओ-पंछी 
मेरे पास तो आ,
यूँ दूर दूर न उड़ता जा ,



पंछी-ओ-पंछी ,
मेरे पास तो आ,
मुझे तुझसे दोस्ती करनी है!!
जानना है तुझसे.
कहा से सीखी तुने 
तिनका तिनका चुग कर
घोसला बनाने की कला?
कैसे तू आसमान वाले 
रस्ते याद रख पाता है?
तेरे इतने सुन्दर रंगीन पंख,
कहा से आये है?

पंछी-ओ-पंछी,
तनिक बात तो सुन!!मुझे भी सीखनी है, 
तेरी फुर्र से उड़ जाने की कला!
तू है क्यों इतना हल्का,
कि हवा के साथ ऊड जाता है,
या पवन से तेरी दोस्ती है  क्या?

दूर दूर से बोला वो,
न ही दोस्ती की कोई पवन से,
न ही मैं कोई कला सीखी है कही 
से,
मैं तो प्रकर्ति का प्रेमी हु,
आसमान का रास्ता
याद कहा रखना पड़ता है?
साँझ होते ही पवन बतला देती ह
राह मुझको,
दोस्त तो तुम भी थे मेरे,
परन्तु  अब तक न जाना किसी इंसान को,
भारी और हल्के की बात नहीं है,
वजन तो तेरा भी कुछ खास नहीं है,

लेकिन तू भारी है,
तेरी सोच से,
तेरे कर्म से, 
तेरे धर्म से,
 












तुझे राह इसलिए नहीं दिखती है,
क्युकी तुने प्रकृति से नाता तोड़ लिया है,
तेरे साथ बंधा था,
बुधि का बंधन 
तुने अहम् से उसको भी छोड़ दिया..

अब मेरे पंख रंगीन हैं,
और मैं उड़ता हू...
और डर है तेरा मुझको,
क्युकी तू अंग नहीं है मेरी प्रकृति का,
और मैं बस प्रकर्ति का साथी हूँ,
तेरा मेरा कोई मेल नहीं है...

पंछी-ओ-पंछी
मेरे पास तो आ,
यूँ दूर दूर न उड़ता जा ,

मुझे तुझसे दोस्ती करनी है...:(

@ Gunjan Jhajharia

2 टिप्‍पणियां:

Barthwal Pratibimba ने कहा…

पंछी से बाते, प्रकृति से जुड़ा उसका प्रेम और उसकी सोच से जुडने का सुंदर भाव

gunjan jhajharia ने कहा…

आभार आपका