मंगलवार, अगस्त 9

मेरी बरात

 कल रात मेरी अंखियों ने कहा मुझसे ,
अब नींद अच्छी नहीं लगती है ,
रस्ते बहुतेरे हैं , 
ढूँढना है मंजिल किस छोर पर सजती है!

मुझे इंतज़ार मिलन की बेला का है,
नगाड़े बजेगे सब ओर,
नाचेगे अपने भी उस धुन पर ,

देखना है ये,
हाथो में फूलों की माला लिए वो 
कब मेरा अभिनन्दन करती है?

अभी न निंदिया को बुलाना तू ,
ज़रा मिलन तक तो रुक जाना ,
मैं चुन लूँ राह वो,
जिससे बरातें निकलती हैं!

कल रात मेरी अंखियों ने कहा मुझसे ,
अब नींद अच्छी नहीं लगती है ,
रस्ते बहुतेरे हैं , 
ढूँढना है मंजिल किस छोर पर सजती है!


विजयी भवः
गुन्जन