बुधवार, अगस्त 24



नादाँ थे हम,जो बेफिक्र बैठे थे,
जब बोये जिंदगी भर फूल है
तो कांटे क्यों काटेगे?

ग़लतफ़हमी थी हमारी "गुंजन",
यहा अपनों का बोया भी काटना
पड़ता है!-----------G.J

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