गुरुवार, नवंबर 24

बस जीते जाओ

मेरा जीवन बन गया बंजारा,
जैसे बिन अपनों के कोई टुटा सितारा...

नयी पीढ़ी का मैं खिलता फूल ,
तो पुराने ज़माने का पका हुआ फल,

कैसे न जिउ अपनी इच्छा .?
कैसे भूल जाऊ फिर जिम्मेदारी...

पिस गया है मेरा मन..
जर्जर हो गयी इच्छाए!

माँ-पापा का सपना बनू?
या फिर जता दू मेरी भावना...

बहुत जिया उनके लिए,
बहुत उनका सपना बनी मैं>>>

न उनका मन भरा,
न कभी तृप्त हुई उनकी प्यास...

बढती गयी उनकी आस,
और बटता गया मेरा जीवन!

फिर भी कभी न सराहा मुझे,
कभी न महसूस किया मेरा प्रयत्न ..

उनकी बेटी बनने को,
छोड़ा सब साथ
संग-सहेलियों का,
न जाना उन्होंने मेरे अकेलेपन को,
और बस
आरोप लगाये हमेशा...कैसे न जिउ अपनी इच्छा .?
कैसे भूल जाऊ फिर जिम्मेदारी...

पिस गया है मेरा मन..
जर्जर हो गयी इच्छाए!

हर दम पाठ पढ़ाती मैं
सबको सीख सिखलाती मैं,
बनना अपने माँ-बाप का सपना तुम!

पर कैसे ये सच जुठ्लाती मैं ?
माँ-बाप अगर नहीं समझे तो?
कहा जाओगे फिर तुम,
किसे अपना बताओगे?
नहीं है इसका कोई जवाब मेरे पास!
आज बस राह नजर आती है,
जिसकी कोई मंजिल ही नहीं है!

बस चलते जाओ,
बस चलते जाओ,
बिना किसी आस के,
बिना किसी स्वप्न के बस जीते जाओ!
जीते जाओ!


गुंजन झाझारिया!





3 टिप्‍पणियां:

Vaneet Nagpal ने कहा…

टिप्स हिंदी में ब्लॉग के फोलोवर बनने के लिए धन्यवाद |

Vaneet Nagpal ने कहा…

मन के भावों को अच्छी तरह से उकेरित किया है | शब्दों की प्रूफ रीडिंग की और कुछ और ध्यान दें | जैसे टुटा को टूटा जिउ को जिऊँ, जाऊ को जाऊं , इच्छाए को इच्छाएं , बनू कि जगह बनूं , दू को दूं इत्यादि | ये छोटी-छोटी बातें आपको आगे चल कर एक उम्दा लेखक के रूप में स्थापित होने में सहायक होंगी | कृपया इसे अन्यथा न लें |

गुंजन ने कहा…

vaneet ji dhanywaad apka..
aap hi sujhaiye koi acha software, mujhe matrao ki achi jankari hai kintu yaha jaldbaji me ek-2 matra ko theek karna sambhav nahi ho pata....