सोमवार, दिसंबर 5

मेरे अपने हो तुम,,


मेरे अपने हो तुम,, 
मेरी बातो पर मुस्कुराये तुम,
मैंने कहा और चले आये तुम,
मेरे आंसुओ की कीमत समझी तुमने ,
रोते मेरे मन को बहलाया तुमने,
जब-जब जरुरत पड़ी किसी दोस्त की 
पिछले दिनों में ,
मेरे साथ निभाया तुमने ,
कभी कभी जिद्दी  बनना तुम्हारा,
पर हर लड़ाई के बाद
अपनापन जताया तुमने,
साथ तुम्हारा इतना अच्छा था ,
मेरा टुटा विश्वास फिर से जगाया तुमने,
रुलाया बहुत, पर फिर मेरी तकलीफ को समझा भी,
अपने जिद्दी मन को समझाया भी तुमने,
इसलिए तो कहती हु मेरे अपने हो तुम..
अच्छा सुनो ,
आज भी जितना हक़ जताती हु,
उतना ही हमेशा जताउगी,
रिश्ते का नाम तो आज भी नहीं पता ,
पर इतना पता है,
मेरे अपने हो तुम....

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर ...मनमोहक रचना

गुंज झाझारिया ने कहा…

roopchandra ji dhanywaad apka..
maine apni rachna dekhi lekin kahi dikhi nahi apke charcha mancha par..kripya ho sake to btaiyega kaha hai?