मंगलवार, जुलाई 3

मैं मुआ

आँखों में हल्की सी नींदे..
स्वप्न ओझल हो गए..
आंखे मसलकर देखा..
पैर चादर के बाहर सो रहे,,
पास उम्मीदों की तख्ती पर,
बाल बच्चे लेटे हुए..
उठ खड़ा हुआ चौंक कर..
माथे से बूंदें झर झर गिरें..
आज तो स्कूल खुल जाएगा..
बड़े वाले को दाखिला कैसे मिले?
बचाया भी बहुत साल भर में..
इतने पैसे नहीं जुटे.
वो साहब तो कुर्सी पर बैठे रहते,
मेरा तन बैल सा जूते,
फिर भी न कमाता उतना,
जाने मालिक कैसा हिसाब करे..
हड्डी हड्डी हो गया शरीर लुगाई का..
कैसे इसकी सेहत बने..
मैं मुआ न गलत काम किया,
पैदा होने से अब तक बस
मालिकों को सलाम किया..
फिर भी मुझ गरीब की कौन सुने..
जो होती है कीमत सामान की,
उसमे भी जाने क्या 'टकस' जुड़े.
मैं क्या जानू स्वाद इस जीवन का,
यहाँ पेट काट काट कर भूख मिटे..
मैं मजदूर,
मेरी चिंता कौन करे....
copyright. गुंज झाझारिया

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

इस कविता के भाव, लय और अर्थ काफ़ी पसंद आए। बिल्कुल नए अंदाज़ में आपने एक भावपूरित रचना लिखी है।