मंगलवार, जुलाई 3

मैं नारी हूँ..

मैं नारी हूँ..
खुद में छुपाये प्रकृति के हजारों राज..
शिकायत है तुम्हारी कि,
तुम मुझे समझ नहीं पाते,
क्या चाहती हूँ मैं?
कभी तुम्हारे खिलते नयनो ने,,,
कभी तुम्हारे मुख के उगले लावे ने,,,
कहाँ मुझे समझाने का अवसर दिया?
बरसों से बंद पड़ी कोठरी में गर्द लगी हुए,
मेरे स्वरुप से अब पुरानी महक आने लगी है!
तुम्हे, तुम्हारी दुनिया में रंग भरने का जिम्मा था,
किन्तु अब प्रतीत होता है
कि तुम्हे रंगों से कोई लगाव नहीं...
अपनी आँखों में अथाह सागर लिए,
भीतर धरती सिमटाये,
जिव्हा पर बिजली की रौशनी
गर्जना के साथ सजाये..
सारी ऋतुओं को अपना गहना बनाये..
मैं नारी हूँ.
तुम अगर बनाने वाले हो,
मैं सहेजने वाली..
तुम अगर गिरने-गिराने वाले हो,
मैं तत्पर हूँ,उठाने वाली हूँ ...
युग दर युग बीतते गए,
तेरे अंदर का दानव बड़ा होता गया..
वैसे तुझमे मुझे समझने का भाव मिटता गया.
सम्मान, शर्म, विश्वास, और भावनाओं के द्वार बंद कर,
तू खुद को स्रष्टि का रचियता समझ बैठा..
अरे ! कितना और बिगादोगे इंसानी रूप को..
अब छोड दो अपने अहम को..और आओ ..
दोनों साथ मिलकर बिखरा हुआ समेटते हैं..
ऐसा नहीं की मैं अकेली काबिल नहीं ..
पर अभी भी मेरे अंदर सामंजस्य, और श्रद्धा है तुम्हारे प्रति..
तुम जब जब बिखरा उठाओगे
खुद क्यों बिखेरा..इसके लिए पछताओगे ..
मैं चाहती हूँ तुम सीखो ..तुम समझो, उठो और संभलो...
फिर अगले ही पल गिरने से ज्यादा चोट न आये,
सोचकर हाथ बनता देती हूँ..
मैं नारी हूँ..
खुद में छुपाये प्रकृति के हजारों राज..
शिकायत है तुम्हारी कि,
तुम मुझे समझ नहीं पाते मुझे ,
क्या चाहती हूँ मैं?
मैं चाहती हूँ तुम सीखो ..तुम समझो, उठो और संभलो...
फिर अगले ही पल गिरने से ज्यादा चोट न आये,
सोचकर हाथ बनता देती हूँ..
मैं नारी हूँ..

copyright गूंज झाझरिया 

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।