मंगलवार, जुलाई 3

उलझन

उलझती चोटी के बालों में उलझने,
साँसे भरती रात दिन..
अंदर-अंदर कुढती रहती,
करती विश्वास को छीण-छीण,
अविरल वेग से दौड़ती नसों में,
हर छोटी बात पकड़ ले जाती..
दीमक के जैसे ये उलझने,
खोखले अस्तित्व की जन्मदाता बनती.
साये के जैसे साथ रहती हरदम,
डर के भावों से प्रेम दिखलाती.
काया को निढाल करती..
दिखने लगती माथे पर झुर्रियाँ,
जो ये ज्यादा साथ देती...
जंगल के नागराज के जैसे,
सर-सर सर से पांव रेंगती उलझने!
कुछ नहीं है इनके पास,
देने और खिलाने को..
ये बस आदम का रक्त पीते जाती..
काट फेंको इनकी जड़ो को,
दे दो इनको आजादी..
उलझती चोटी के बालों में उलझने,
साँसे भरती रात दिन..
@copyright गुंज झाझारिया

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

काट फेंको इनकी जड़ो को,
दे दो इनको आजादी..
उलझती चोटी के बालों में उलझने,
साँसे भरती रात दिन.
वाह!बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ !

यह एक उत्कृष्ट रचना पढ़ी आज. अति सुन्दर .....बधाई!