मंगलवार, अगस्त 7

उलझनों के पीछे का सच...


सब उलझनों के पीछे का सच
ऐसा सच जिससे कोई वाकिफ नहीं..
बिलकुल सफ़ेद वस्त्र जैसे,
जिस पर कोई दाग नहीं..

ये कौनसा सच ?

सच तो सच्चाई है..
जिससे कोई अनजान नहीं..
फिर ये क्या बला है..
जिसका किसी को ज्ञान नहीं..

अरे ये अविश्वास है,
ये किसी रौशनी का प्रकार नहीं..
खुद पर उठाया सवाल है..
यह कोई तलवार नहीं..

सच की धार ज्यादा है..
फिर ये कैसा सच का सत्य ?
जिसका कोई आर-पार नहीं ..

अन्धकार का साथी है,
पर झूठ नहीं..
है सच यही ...
पर सच्चा नहीं....

भागना दूर खुद पर चलाये तीर से है..
उलझनों से कोई भय नहीं..
लड़ना तो भीतर से है..
बाहर कोई क्षय नहीं..

उम्मीद की थाम कलाई चलना है..
सच का कोई घर नहीं...
खुद को काबिल करना है..
वरना बीमारियों का कोई अंत नहीं..

सब उलझनों के पीछे का सच
ऐसा सच जिससे कोई वाकिफ नहीं..
बिलकुल सफ़ेद वस्त्र जैसे,
जिस पर कोई दाग नहीं..

copyright गुंजन झाझारिया "गुंज"
 

1 टिप्पणी:

bkaskar bhumi ने कहा…

गुंज जी नमस्कार...
आपके ब्लॉग 'अहसास' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 10 अगस्त को 'उलझानों के पीछे का सच...' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
धन्यवाद
फीचर प्रभारी
नीति श्रीवास्तव