रविवार, सितंबर 16

२ हाथ भूसा


स्तब्द निरीह मासूम कातर नयनो से वो देखती,
और फिर चरने लगती ....
प्लास्टिक की थैली, कूड़ा-कचरा...
रोज सुबह-शाम बैठती घर के आगे,,,,
उसके पीछे पूँछ हिलाता वो नन्हा, 
आँखों से टपकता निर् उसके...
नन्हे की मक्खियों को उडाती वो..
गंदगी में बैठी,
गन्दगी चाट चाट कर साफ़ करती वो माँ..
ले गया कोई भूखा दूध का,
नन्हे को पीछे छोड गया,
२ हाथ भूसा बचाने के लिए..
उदास, हतास, वो नन्हा..
अभी तो रोटी भी नहीं खा पाता ..
२ दिन में कचरा चरना सीख गया...
खून जलता देख उसे मेरा..
देखो इंसान कितना गिर गया..
अब देती हूँ टुकड़े रोटी के उसको,
सुबह दोफर शाम दौडकर आता है..
पूरे ४ महीने हो गए ,
अब भी किसी परायी गाय को देख,
उसके पीछे हो जाता है..
खोजता अपनी माँ को ..
फिर उदास लौटकर आ जाता है..
Gunj Jhajharia

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