शनिवार, सितंबर 29

एक पतली डोरी/
एक छोटी सी गांठ/
एक हिस्से तुम/ 
एक हिस्सा मेरे नाम/
कहे लोग गांठ लगे तो मन मैला हो जाय/
कहू मैं/
जो बीच हमारे धागा ही ना रह जाय/
इधर तुम पकडे चले आओ/
उधर मैं खिची चली आऊ/
मिल जायेंगे जहाँ गाँठन रह जाय..
छोड धागे को एक हो जाएँ/
ना धागा टूटे, ना गांठ की फिक्र सताए/
धागा तो बस मिलन की राह दिखाए/
प्रेम हो जाए इतना हरा...
गाँठन छोड डोरी तक की जगह ना रहने पाए/

गुंजन झाझारिया

कोई टिप्पणी नहीं: