शनिवार, सितंबर 28

मुझे खुदा बना दिया

आरजू-अ-जिंदगी कि मुझको कोई खुदा कहे,
जवाब था,जब पुछा !
मैं आहत जब टूटते सपने,
वो खोजे भीतर जवाब अब भी,
टटोले मेरे टुकड़े!
रौशनी से चुंधियाती आँखें उसकी,
मेरे भीतर जिसकी लौ जली थी!
जिंदगी है अब भी मुझमें,
वही जन्म लेता इंसान मेरे भीतर!
कहकर कि
इंसान है तेरा अंश
अ खुदा मेरे,
तुने मुझे खुदा बना दिया !
Gunj Jhajharia

5 टिप्‍पणियां:

Upasna Siag ने कहा…

bahut sundar

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

सुंदर रचना |

मेरी नई रचना :- जख्मों का हिसाब (दर्द भरी हास्य कविता)

Pallavi saxena ने कहा…

गहन भाव अभिव्यक्ति...

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,धन्यबाद।

गुंज झाझारिया ने कहा…

आप सभी का धन्यवाद..एक अरसे बाद ब्लॉग जगत में वापसी की है..इसलिए आप सभी का सहयोग चाहिए..