गुरुवार, मार्च 13

राई का पहाड़

सुना है,
हमारे किस्से सरेआम हो गए?
जिनमें तुम यूँ ही मुस्कुराए,
और मैंने यूँ ही शरमा दिया था।
राई थी,
पहाड़ बना,
एक जैसा कुछ तो है हमारा,
तभी खोजती आँखों ने ढूंढ़ ली राई,
किसी को हिसाब देने का ईरादा नहीं,
हर लम्हे को जीवन कहना,
हम दोनों की आदत,
थी और हमेशा रहेगी।
© गुंजन झाझारिया

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