रविवार, मार्च 23

अलसाई सरसों

अलसाई सरसों में सौन्दर्य है,
बस आँखों में रंग होने चाहियें,
कण कण ईश्वर,
जरुरी है,
भाव सुंगंधित होने चाहियें।
एक स्त्री की ओढ़नी से,
पौंछ ले धब्बे काले,
जिस पर रंग दूजा नही चढे,
उसका मोल,
ऊँचा लगना चाहिए।
संध्या की पायल,
खनकती रहेगी सदा,
बिन बौखलाए,
प्रभात को गाना चाहिए।
पाक दहलीज,
हर घर के आगे,
लांघने से पहले,
माथे लगा चूमना चाहिए।
मस्तिष्क है घर,
बेबुनियादी शर्तो का,
मिलावट करता छल,
ह्रदय का सम्मान,
नहीं घटना चाहिए।
तू सदी-स्त्री,
तेरा भी अपना एक,
ईमान होना चाहिए।
धर्म छोड़ चाहे,
कर्म ना छोड़,
नहीं कोई ऊँचा नीचा,
पहाड़ चढ़,
माटी वहाँ भी मिलेगी,
जीव को जीव समझ,
आईने में पहचाने स्वयं को,
ईरादा भाप होना चाहिए,
केवल शुद्ध पानी,
बिना फ्लोराइड का।
© गुंजन झाझारिया

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