रविवार, मार्च 23

'मैं' मुझे खोजने दो।

मैं हूँ कोई खिलौना बुना हुआ,
या कोई मोहरा चुना हुआ।।
निराकार हूँ कि साकार,
मोक्ष या माया,
मैं क्रोध हूँ, अग्नि हूँ,
जल हूँ तरंगित, या
बर्फ आधी जमी।
मैं सागर गहरा,
प्रकृति का पहरा,
मैं ज्वालामुखी दबा हुआ,
या कोई आकाशगंगा हूँ,
अनगिनत सितारों से भरा रहस्य।।
सम्मान की भूख हूँ,
या अभिमान का अहंकार,
हूँ कोई अधिकार पत्र,
या फिर अपमान का मुखौटा,
मैं स्वार्थ हूँ,
कीचड़ का कमल हूँ,
या सूअर की नाक,
बदबू पहचान लेने वाली..
मैं सफ़ेद हँस,
या चमत्कारी डायनासौर,
विशाल, सर्वनाशी,
मैं रचियता,
हवा से घर बनाने में समर्थ,
या हूँ बवंडर,
उम्मीद ढाने वाला।।
मैं सुरंग,
अँधेरी, गहरी,
मैं निःस्वार्थ दान हूँ,
या मैं,
कपट से छिना गया गहना।
पथरीला कंकड़ हूँ,
आँखों में चुभने वाला,
गाली हूँ,
या आशीर्वाद का बोल,
मैं ताश का पत्ता,
या ताज जीत का,
प्रेम हूँ दबा हुआ,
या नाता गुरुर का,

# मैं जो भी हूँ, मुझे खोजने दो।
तुम्हारा शौध मेरे काम का नहीं।
© गुंजन झाझारिया

कोई टिप्पणी नहीं: