रविवार, मार्च 23

कवयित्री

कवियित्री लिखती है कविताएं,
झोंक देती स्त्रीत्व,
पैदा करती किरदार,
पालती,
भीतर ही भीतर,
अंतः सजाती,
निश्छल सींचती,
उठना-सम्भलना,
सिखलाती,
नारी रंगा चित्र,
मन-मोहक,
प्रेम कर बैठती,
स्वयं निर्मित किरदार से,
ज्ञाता त्याग जानती है,
बांटती बाज़ार में,
पानी का रंगीन बुदबुदा बन,
फूट जाती रचना,
कौन समझा है ,
नारी का त्याग।
मोल नहीं,
अश्रु,
सादगी, उम्मीद का।
मुंह ढक रोती है,
अनमोल किरदार,
बेकार,
न पड़ती,
स्त्रीत्व छाया,
तब नहीं ढूंढता,
काया कोई।
सूजे चक्षुओं से,
बैठती है,
निर्माण को ,
किरदार नया।
इस बार,
नहीं होगा ममता गुलाल,
या होगी,
काया कोमल।
कवयित्री लिखती है,
कविताएं।
© गुंजन झाझारिया

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