गुरुवार, मार्च 13

छेद

धुरंधर रोते हैं अंधकारों में,
गुप्प अन्धकार से अश्रुओं का मिलन,
कीमत सिखाता प्रकाश की,
अलग नहीं है कुछ,
बाँट देते हैं वो समय को,
चढ़ाई और आराम को,
छांट देते दिशाएँ ।
शेर अचूक शिकारी,
जानता कब कहाँ?
घात को हथियार बना,
करता इंतज़ार,
उर्जा तुझमें भी अपार,
ले समय,
और होगा विस्तार,
सटीकता का खेला,
बन गया अर्जुन,
जिसने भी है खेला,
दिग्गज भी झुकाते हैं सिर,
कब कहाँ?,
सोचकर ही फिर,
ज्योतिषी पूजती दुनिया,
उचित समय की लड़ाई में,
जाने धीरज जो,
मानुष कहलाता।
शीघ्रता का पल्ला पकडे,
वो दानुश बन जाता।
हाँ,
तीस मार खां गिरते चोटी से,
शौक नही मनाते,
क्यूंकि,
उठकर चढाई का,
समय निर्धारित रहता,
कोई नहीं है भेद फिर,
है कच्चा तू अगर,
पहले सीख निशाना बांधना,
कर छेद फिर।।
© गुंजन झाझारिया

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