गुरुवार, अप्रैल 3

"मैं"

भीतर सन्नाटा है आजकल,
शांत बयार बह रही है,
कहर आया था,
कोई क्या सोचेगा जैसी लाइलाज बीमारियाँ लेकर,
उथल पुथल मचा दी थी,
मैं 'मैं' ना रही,
मेरी चाहतों पर,
गर्द भरा कपडा रख,
लक्ष्य को भूल,
'फलाने' पर 'इम्प्रैशन' जमाना ही दिनचर्या थी,
आह! रूह कांप उठती है,
उस बिमारी का बहुत दर्द सहा,
छुटकारा नामुमकिन है,
ऐसे कई तर्क सुने,
दिन-रात लड़ाई लड़,
काले अंधड़ से जीत लाई "मैं" को,
कौन कहता है "मैं" शत्रु है,
शत्रु "फलाना" है,
हाँ,
इलाज़ भी है,
निजात पा ली है,
उम्र भर के लिए,
मैं अबके बरस "मैं" लिखुगी,
फलाने साए से निडर हो,
क्यूंकि,
उसे सिर्फ मारा नहीं,
मैंने उसका अंतिम संस्कार भी किया है,
नहीं, हरिद्वार नहीं,
अपने सुकून की शीतल जलधारा में बहा दिया।
"मैं" अब स्वस्थ हूँ,
कलम थाम "मैं" लिखने को।
© गुंजन झाझारिया

कोई टिप्पणी नहीं: