बुधवार, अप्रैल 23

मुझे लड़ना भाता है।

मुझे लड़ना भाता है।

फितरत में बसा है,
लड़ना मानुष के।
जैसे जन्म के समय,
माँ लड़ी थी दर्द से,
मृत्यु के काल से,
नन्हा लड़ा था तब,
धरती पर अवतार से,
बाहरी प्रकाश से,
लड़ा था छुटपन में,
स्वयं अपनी चाल से,
गिरने-उठने,
हरदम सहारे वाले हालात थे जब,
चल कर जता दिया बल ,
तो कद रह गया छोटा,
लड़ा तब उंचाई की ढाल से,
हरदम फिर चिर यौवन में,
डट कर लड़ा,
"हारमोंस" की बौछार से,
प्रेम में हारा, रोया अंधेरों में,
पर नहीं रुका,
पढ़ाई ने मारा, तू नहीं झुका,
समाजी तूफ़ान ने उड़ाना चाहा,
हिला तक नहीं तू रत्ती भर,
कमाने को भोजन छोड़ा,
भूल गया तू दिन और रात,
त्याग दिया अपनों का साथ,
नींद से लड़ा रातों में,
दिन में झगड़ा इच्छाओं से,
मशीनें तेरी बनाई थी,
बना लिया तुझे गुलाम,
नहीं स्वीकार्य गुलामी तुझको कभी,
उनसे भी उलझा हर साँस,
कृष्ण हो गया रे तू तो मानुष,
आये राक्षश लाख,
तू नहीं डरा,
उँगली पे उठा लिया जज्बा तूने,
रोया चिल्लाया,
की गलतियाँ जी भर,
पर सांचा राहगीर तू,
चलता रहा, लड़ता रहा,
छिलता रहा,
खुद आप दवा बना,
फितरत में रमा लिया,
लड़ना मानुष ने।
मुझे भी ये लड़ना भाता है,
नहीं पूछना,
"कब तक" का जवाब,
मुझे डटे रहना जमता है।
© गुंजन झाझारिया

2 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (25.04.2014) को "चल रास्ते बदल लें " (चर्चा अंक-1593)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया व सुंदर , गुंज जी धन्यवाद !
नवीन प्रकाशन -: बुद्धिवर्धक कहानियाँ - ( ~ सच्चा साथी ~ ) - { Inspiring stories -part - 6 }

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