रविवार, अप्रैल 27

मेघ में लपेट भेजना सन्देश

तेवर गरम मिज़ाजी हैं,
मौसम के इन दिनों,
इन्ही दिनों में उनका सन्देश भी आने वाला है,
इतना जमा हुआ अहसास है वो,
फिजाओं के असर से पिघल कर,
राह में टपक गया तो?
राहें तो सुंगंधित हो ही जायेंगी,
मैं उस सुगंध के सहारे ढूंढ़ भी लुंगी,
पता उनका,
क्या होगा मेरे आँगन का?
जो उस अहसास को छूने,
अपने भीतर बसाने को,
स्वयं की गंध भुलाकर फ़ीका पड गया है,
जिसकी रेत रोज गीली करनी पडती है अश्रुओं से,
फिर भी सूख जाती है हर शाम वो,
जहाँ पानी के नलके से बरसता है गीलापन,
और भिगो देता है अन्तर्मन,
जाने कहाँ से आती है इसकी पाईपलाइन,
जो दे जाती है उम्मीद,
उसके अहसास के गीले रहने की,
लौट आने की,
तेवर गरम-मिजाजी हैं,
मौसम के इन दिनों।
सन्देश के चारों और मेघ लपेट कर भेजना प्रियवर!
मेरे आँगन को खुशबू का इंतज़ार रहेगा।
© Gunjan Jhajharia

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