गुरुवार, अप्रैल 3

आज लिख

लिख दे तू दर्द सारे,
अंगार स्याह आखर में,
तड़प, जूनून को दे रगड़क,
सफ़ेद पर कालिख रंग,
लहू लिख, आह लिख,
सीने में उठता उबाल,
लिख तू,
दुनियां में बढ़ता बवाल,
चीखें चुन, घाव सूंघ,
कर्कशता, कायरता बेहिसाब लिख।
तबाही का एलान लिख,
क्रोध, अभिमान लिख,
अँधेरे का भय,
टूटती साँस का क्षय,
बढती उम्र का,
छीनता मान लिख।
है तुझमें जो ताकत,
लिख आज तू,
पैदा होते शिशु का शंखनाद,
पागल माँ की प्रसव-पीड़ा,
मांस के उड़ते चीथडों के बीच,
भोजन सूंघता नर,
राख होती कायनात लिख।
बहुत कुछ होगा तेरे पास,
मगर इस बार तू बस,
कांपती हथेलियों की बैसाखी लिख,
जो बाँट देती है तकलीफ,
अंग कार्यशील न होने की।

# बदले में मैं चहकती चुनिया लिखूंगी। :)
© गुंजन झाझारिया

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