रविवार, अप्रैल 27

हमेशा, हर बार

हमेशा,
एक बार,
हर किसी को वापस लौटना होता है,
उसी स्थान पर,
जहाँ से शुरुआत की थी,
और तब जरुरी हो जाता है,
छिपी हुई बातों का हवा हो जाना।
हाँ साहिब,
पृथ्वी गोल है,
जीवन चक्र भी,
उसी प्रकार ईर्ष्या और प्रेम भी गोलाई लिए हुए हैं।
ह्रदय से निकला प्रेम का तार,
खाली होकर भी खाली नहीं होता,
बरसों बाद जब निकलता है,
झरना बन,
संकड़ों गले तर हो जाते हैं।
ईर्ष्या भी दोगुनाती है,
और सामने आती है,
इच्छाधारी नागिन बन,
कभी नहीं हारने और डसने का संकल्प लेकर,
चाहे तपस्या पूरी करने में,
सालों का समय निकल जाए,
सब तुम पर है,
रुई की गुदगुदाहट चाहिए या नकली कपास।
एक बार,
हर किसी को वापस लौटना ही होता है।
© Gunjan Jhajharia

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