बुधवार, मई 28

जिंदगी एक कविता

नहीं सूझती कविता अब कोई,
जिंदगी खुद एक कविता बनी है।
ढली है सुरमई शाम बनकर,
शंखनाद बन सुबह को गूंजी है।
विराम मिला है बुद्धि को,
जैसे युद्ध के बाद,
प्रेम युग की शुरुआत हुई है।
जीत हार से परे अब,
जीवन की पुकार सुनी है।
धीर पनपता है भीतर मेरे,
क्या बताऊं तुम्हें,
सुकून की बरसात उमड़ी है।
एक अद्भुत रौशनी मार्ग खड़ी है,
जब से,
जिन्दगी खुद एक कविता बनी है।
© गुंजन झाझारिया

4 टिप्‍पणियां:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-05-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1627 में दिया गया है |
आभार

Rewa tibrewal ने कहा…

waah bahut sundar kavita

Vaanbhatt ने कहा…

सुन्दर भाव...बहुत खूब...

RavindraPandey ने कहा…

वाह

क्या खूब लिखा है जिंदगी के बारे में...